Friday, August 16, 2013

जिनगी, शह आ मात

पेट जखन
भारी पड़ल
प्रेम पर
त' डेग स्वतः
निकलि गेल
दानाक ताक में

ट्रेन छोड़ैत गेल
स्टेशन
आ छूटल गेल
अपन
माटि-पानि , गाछ-वृच्छ
घर-दुआरि , संगी-साथी
भाय-बहिन, माय-बाप
बाबा-बाबी

संग रहि गेल
मनक पौती में
ओरिआओल
स्मृति मात्र

समय अपन चालि चलि देलक अछि
आ हम
जिनगीक देल गेल "शह" सँ
अपन "मात" बचयबाक चालि सोचि रहल छी



  

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