Wednesday, December 2, 2009

हेरायल शैशव

होइछ इच्छा शिशुए रहितहुँ
देख' पड़ैत ने जाति-धर्म वा
तथाकथित सामाजिक स्थान अपन
हंसबा लेल आ कि कनबा लेल
हँसितहुं तखने जँ मन खुशी
जँ मन दुखी तखने कनितहुं
होइछ इच्छा....................................

होइछ इच्छा शिशुए रहितहुँ
कर' पड़ैत ने छल कपट आ दुर्व्यवहार
ई जिनगी कें जीबाक लेल
वा पेट मात्र पोषबाक लेल
पी लितहुँ माय केर दूध और आशीष
संगे जीवित रहितहुँ
होइछ इच्छा........................

होइछ इच्छा शिशुए रहितहुँ
कर' पड़ैत ने मारि-पीट आपा-धापी
एहि अर्थयुगक बनबाक लेल
वा दलदल में धँसबाक लेल
स्नेह वृष्टि में भीजि-तीति हम आनन्दक
अनुभव करितहुं
होइछ इच्छा.................................

होइछ इच्छा शिशुए रहितहुँ
देख' पड़ैत ने लुप्त होइत
मानवता मानव केर मन सँ
सुख-शान्ति सबहक घर आँगन सँ
सब क्यौ शैशव सँ शिक्षा ल'
निश्छल, निश्पापी बनि पबितहुँ
होइछ इच्छा.................................

Tuesday, December 1, 2009

तू आगू बढ़ शुरुआत त कर.................

ऐ घोर निराशा में डूबल, प्राणी तू बढ़ शुरुआत त' कर
आकाश सेहो तू नापि सकै छें, अपना पर विश्वास त' कर
तू आगू बढ़....................

जँ राति भेलई भिनसरो हेतई, ई सत्य थिकै ने मेटा सकै
ई समयचक्र एहिना चलैत अछि, मुदा एकर सम्मान त' कर
तू आगू बढ़.........................

बस व्यर्थे नोर बहौने की? समदाउन उदासी गौने की?
हम गीत विजय केर गायब सदिखन, प्रण ई ल' जीवन में चल
तू आगू बढ़ .............................

भगवानो मदति करथि ओकरे, जे सतत कर्म में लागल हो
फुसिए चिंता त्यजि जग भरि कें, जो कर्तव्यक पालन तू कर
तू आगू बढ़ ................................

किछु काज एहन कर जीवन में, जे मानवजातिक हित में हो
मरियो क' अमर बनल रह्बैं, मनु कल्याणक तू बाट त' धर
तू आगू बढ़...................................

मंत्री उवाच..................

छी मनुक्ख आ राजनीति करबाक अहाँ इच्छा रखैत छी
जन्मे सँ बुड़िलेल थिकहुँ की लोक देखि क ' भगल करै छी

देखू हमरा गत दसो वर्ष सँ मंत्री पद पर बैसि रहल छी
जे अबैत अछि सत्ता में हम तकरे पार्टी पैसि रहल छी
शहर राज्य केर किछु रईस में अपन नाम हम देखि रहल छी
फिफ्टी परसेन्टक लगभग त' फंडे में स' चूसि रहल छी
राजनीति में श्रेष्ठ थिकहुँ हम तें अपने स कहल करै छी
जन्मे सँ.....................................................................

समयक बंधन में नहि रहि हम अपन प्रतिष्ठा सतत बढाबी
पैघो सँ' पैघो अफसर कें आँगा-पाँछा अपन घुमाबी
अपने कतबो किछु क' ली धरि नीति केर उपदेश सुनाबी
शिलान्यास दस बीस पचासों क' नेता हम नीक कहबी
नेता केर हो एहन दुर्दशा? तें अपने स कहल करै छी
जन्मे सँ बुड़िलेल ....................................................

जे बाजब से किए करब हम मूलमंत्र बनब' पड़ैत अछि
ठकि फुसिया फेर भोट लेलहुँ ई प्रजातंत्र एहिना चलैत अछि
कतहु कतहु तँ बूथो तक कैप्चर हमरा करब' पड़ैत अछि
साम दाम वा दंड भेद सब विधा अपन लगब' पड़ैत अछि
बड़ सोझ सरल व्यवहार देखै छी, तें अपने स' कहल करै छी
जन्मे सँ..................................................................

आतंकी सबहक विरुद्ध जा अपना आफत किए मोल ली
लूटपाट में अपनहुँ छी तें ओकर पोल हम किए खोलि दी
सबटा बुझितो जनितो ओहि में अपना कें झोंक' पड़ैत अछि
आ राजनीति करबाक जँ इच्छा मानवता छोड़' पड़ैत अछि
गाँधी केर तीनू बानर कें अपन हम आदर्श बुझै छी
जन्मे सँ बुड़िलेल.........................................................

Friday, November 20, 2009

व्यथा

हम कोना क' हँसी हम ई बाजी कोना
हमर नोरो सुखा गेल कानी कोना ?

हमरा दिन केर इजोतो अन्हारे लगय
हम जे सोनो उठाबी त' माटिए बनय
हमहूँ नचितहुँ कने से जखन मोन हो
हमर घुघरू हेड़ा गेल नाची कोना?
हम कोना........................................

माछ दहियो सँ जतरा सुजतरा न हो

हम त' डेगो उठाबी जे खतरा न हो

हमहूँ गबितहुं कने से होअय लालसा

कंठ स्वरहीन भ' गेल गाबी कोना ?

हम कोना...................................


फूल केर बीज रोपी त' काँटे उगय

बात केहनो मधुर जग कें कड़ुए लगय

हमहूँ छुबितहुं गगन होय इच्छा प्रबल

छत सेहो नहि बचल नभ कें छूबी कोना?

हम कोना............................................



हमर घूँघरू भेटत मन में अछि आस से

कंठ में स्वर घुरत फेर विश्वास से

ओना छथिहो विधाता सेहो बाम छथि

हम अपन याचना ल' क' पहुँची कोना

हम कोना.......................................

Tuesday, November 17, 2009

पिंजराक चिड़ै

ई बंधन जँ छुटि पबितय ओहि चिड़ै जेकाँ हमहूँ उड़ितहुँ
पाँखि अपन पूरा पसारि सब ठाम भ्रमण हमहूँ करितहुँ
ई बंधन.....................................................................

एहि डारि खन ओहि डारि पर फुदुकि फुदुकि हमहूँ नचितहुँ
अपना बयसक मीत सभक संग उड़ि आकाश हमहूँ छुबितहुँ
अपन नीड़ हमरो रहैत अभिमान तकर हमहूँ करितहुँ
ई बंधन .........................................................................

जखन तखन क' घूमि टहलि खयबा लेल दाना हम चुनितहुँ
धिया-पुता के खुआ पिया बचितय तं हम अपनो खईतहुँ
अपन मेहनतिक सुफल केहन होइत छै से हमहूँ चिखितहुँ
ई बंधन.............................................................................

जँ भेटितथि भगवान पुछितियनि कोन कर्म के सजा देलहुँ
की बिगाड़ने छलहुँ अहँक जे एहि जाल में फँसा देलहुँ
ई दुर्दिन देखबा सँ बढियां मरण वरण कयने रहितहुँ
ई बंधन.....................................................................

Friday, November 13, 2009

अंतर्द्वंद

हम जाय रहल छी कतय सैह नहि बूझि रहल छी
तें अपने अन्तःमन सँ सदिखन जूझि रहल छी

अपने विचार अगले क्षण मिथ्या बुझा रहल अछि
तें हमरा आगाँ पाछाँ नहि सुझा रहल अछि
बैसल छी सोचबा लेल किच्छु नहि फुरा रहल अछि
सबटा विचार मनहिक भीतर घुरघुरा रहल अछि
हम किदन कहाँ छी बाजि रहल से बूझि रहल छी
अपने अन्तःमन................................................

प्रकृति संग मनमानी देखि अचंभित छी हम
प्रकृतिक पलट प्रहार सोचि बड विचलित छी हम
एकसर की क' सकबै तें चुपचाप रहै छी
मानवकृत अत्याचारक सब अभिशाप सहै छी
क्यौ ने सुननिहार अछि व्यर्थे भूकि रहल छी
अपने अन्तःमन............................................

लोकक देखि तमाशा मन अकबका रहल अछि
सम्बंधोक विचार न तें सकपका रहल अछि
नैतिकता केर ह्रास देखि छटपटा रहल अछि
आगाँ केर परिणाम सोचि कपकपा रहल अछि
हम बताह छी वा ओ से नहि बूझि रहल छी
अपने अन्तःमन..........................................

Sunday, November 8, 2009

मूल्य सेहो बेसी नहि...............

हमर कविताक पांती पहिल थीक
ज' कही नीक लागल त' आगू बढ़ी
नहि त' छोरब अपन जिद ने कविता लिखब
मुदा अपने कहू तखन की हम करब

किछु काजो करबा में त' नहिए सकी
सोचलहुँ जे बैसि थोरे कविते लिखी
आखर दू आखर में पृष्ठ एक पूर करब
आ दू पृष्ठ पूरिते त' कविते ख़तम करब

हे कविता कतेक लिखब चालीस पचास
आ पृष्ठों बड बेसी त सयक आसपास
आ ताहि पर ज' भूमिका विधायक जी लीखि देलनि
जे हमरा कलम में सरस्वतीक बास छनि

तं लक्ष्मीओ के अयबा में कोनो टा भाँगट नहि
जे ओ पढ़त से त' एक्कहि टा मांगत नहि
हे पॉँच सय नहि चारिए सय प्रति जँ बिका गेल
ई अदना सन कवि केर त' जीवन उद्धार भेल

टाका जुनि पुछू पाग डोपटा सम्मान भेटत
कवि लोकनिक पांती में आगाँ ई नाम भेटत
तं आज्ञा भेटत हमरा आगाँ बढ़बाक लेल
फाइनेंसर तैयार छथि टाका देबाक लेल

पोथी केर आउटलुकक चिंता अहाँ जुनि करू
जेबी के करबा लेल ढील ब़स तैयार रहू
पोथी सजिल्द कूट लागल नफीस रहत
आ मूल्य सेहो बेसी नहीं दू सय पचीस रहत

Tuesday, October 20, 2009

की प्रगतिशील तखने हम छी?

की प्रगतिशील तखने हम छी?
जँ आन देश केर भाषा केर हम गर्वित भ' क' बाजी
आ अप्पन भाषा केर बिसरी जाई .......................

की प्रगतिशील तखने हम छी?
जँ कर्म कुकर्मक भेद मिटा कत्तौ कखनो हम किछु क' ली
आ अप्पन सदगुण बिसरी जाई...................................

की प्रगतिशील तखने हम छी?
जँ श्रेष्ठहुं के आदर नहि दी
आ संस्कार हम बिसरि जाई..........................................

की प्रगतिशील तखने हम छी?
जँ कपड़ा लत्ता फोलि फालि नँगटे कत्तहु बुलैत रही
आ संस्कृति अप्पन बिसरि जाई............................

जागू जागू हे आर्य लोकनि! एखनो समय अछि बचयबाक
एहि संस्कृति कें,एहि सदगुण के, एहि संस्कार ओ भाषा कें
जकरा बुझय लय अपनयबा लय लोक अबै छथि दूरो सँ
तकरे कोना हम बिसरि जाऊ

नहि ई नहि होयत से प्रण ली सब अपना मन में
ई प्रगतिशीलता जँ अपना देशक अस्तित्वे मिटा देत
तँ नहि होयब हम प्रगतिशील
बस होयब सुच्चा राष्ट्रभक्त आ कर्मठ अपना जीवन में
तँ प्रगतिशील मानय पडतै
सब देशहि कें विश्वक समक्ष

गीत एक गायब ओहि दिन हम
प्रगतिशील तखने हम छी जँ
अपन भाषा ध्यान रहय, अप्पन सदगुण कें नहि बिसरी
संस्कार सेहो बस ध्यान रहय
आ अप्पन संस्कृति लेल मन में सब सँ पहिने स्थान रहय

प्रगतिशील तखने हम छी..........................
प्रगतिशील तखने हम छी..........................

दुविधा

हम चेतन छी की नेने छी ?
किछु गुण चेतन केर पौने छी
आ किछु में एखनो नेने छी
हम चेतन छी की नेने छी..............


ई बयस होइछ सबहिक जीवन केर से पड़ाव
जे सबठां दू टा बाट एक टा नीक तथा दोसर ख़राब
ई प्रश्न सदा मन में रहैछ जे चयन ककर हम कयने छी?
हम चेतन छी की नेने छी..............


ई बयस बहुत सुंदर कहबा लेल होइत अछि
किछु बात चेतनो के बुझी आ नेनपन सेहो रहैत अछि
पर अन्तःपीडा अपन लोक अपने बूझय
ने चेतन आ ने नेने में स्थान अपन हम पौने छी
हम चेतन छी की नेने छी..............


चेतन-नेना, नेना-चेतन केर प्रबल द्वंद
दिन राति किंतु बीतल जाइछ गति मंद मंद
बस एक प्रश्न अपने सब स' पूछय चाही
जे अपनहु सब की एहिना बयस बितौने छी
हम चेतन छी की नेने छी..............

Monday, October 12, 2009

परिवर्तन

आब समूचा दुनिया ई पहिने सँ अछि आगाँ बढि गेल

आई फेर मुनचुन बाबा केर शुरू भेलनि भाषण केर रेल


कहलनि हम गामे सँ दरिभंगा पैरे चलि आबी

भिनसर में सबसँ पहिने प्राती गबैत छलथिन बाबी

आब लोक अछि गुडुकि रहल से सबटा अछि चक्का केर खेल

आ एहि सीडी कैसैट युग में किए प्रतीक्षा भिनसर लेल

आब समूचा दुनिया ई.................................................


पहिने लालटेन वा डिबिये सँ चलि जाइत छल सब काज

पहिने लिखल जाइत छल चिट्ठी से पहुंचै छल मासों बाद

आब मरकरी केर इजोत सँ घर आँगन अछि जगमग भेल

आ एहि टेलीफोनिक युग में अमरीको कोनटे लग भेल

आब समूचा दुनिया ई.................................................


पहिने दीपावली राति में छल लगैत दीपेक कतार

आ फगुआ दिन भीजि जाइत छल रंगहि सँ सब यार भजार

आब दीप केर जगह समूचा झालरि और फटक्का लेल

आ एहि इंटरनेटी युग में खेला लेत फगुआ ईमेल

आब समूचा दुनिया ई.................................................

Saturday, October 10, 2009

हमर दादाजी

सन् पचीस में चंद्रोदय भेल संघक उदयक संगे
जाहि समय में होइत छल हल्ला फसाद आ दंगे


पिता हिनक तेजस्वी पंडित , विद्या विनय सकल गुण मंडित
संस्कृत विषयक रहि आचार्य , पुनि बनलाह प्रधानाचार्य
दूर दूर तक घूमय गेला हिनका संगे संगे
सन् पचीस में........................................

ज्येष्ठक गुण सहजे अपनौलनि , अपनों प्रतिभा मांजि बनौलनि
सभा मंच पर हंसा हंसा क' , हास्य कविक ई पदवी पौलनि
यात्री जी भागिन सुभद्र झा मामा दुहु बेढंगे
सन् पचीस में........................................

बहुतो पुरस्कार छनि भेटल , अपन लिखल पोथी छनि गेंटल
भरि जीवन अध्यापन कयलनि , पूज्य पिता केर रस्ता धयलनि
सरस मधुर वाणी सं' सबकें रंगलनि अपने रंगे
सन् पचीस में........................................

करथि दुलार तते दादाजी , दुनू भाय के अछि आजादी
आशीर्वाद हिनक ज' पायब , सब उपदेश हिनक अपनायब
हम आदित्य विभूति पौत्र त' थिकियनि हिनकर अंगे
सन् पचीस में........................................

Friday, October 9, 2009

परिचय

सब सं पहिने एहि ब्लॉग केर दर्शक आ तकर बादो इच्छा राखि हमर कविताक पाठक लोकनिकें हमर नमस्कार। यदा-कदा जखन अतिव्यस्तता नहि रहैत अछि तखन कखनो क' किछु विचार मोन में उठैत अछि जे पंक्तिबद्ध भ' कविता सन भ' जाइत छैक आ कखनो क' विचारे ततबा शक्ति संग अबैत छैक जे आन काज छोडि एही में व्यस्त होबय परैत अछि। कयिएक बेर कैक टा लिखाइत छैक फेर अपने नीक नहि लागल त छोडि देत छियैक । ताहि में स' जे अपना ठीक ठाक बुझा परल से अहाँक समक्ष राखि रहल छी।