Tuesday, November 17, 2009

पिंजराक चिड़ै

ई बंधन जँ छुटि पबितय ओहि चिड़ै जेकाँ हमहूँ उड़ितहुँ
पाँखि अपन पूरा पसारि सब ठाम भ्रमण हमहूँ करितहुँ
ई बंधन.....................................................................

एहि डारि खन ओहि डारि पर फुदुकि फुदुकि हमहूँ नचितहुँ
अपना बयसक मीत सभक संग उड़ि आकाश हमहूँ छुबितहुँ
अपन नीड़ हमरो रहैत अभिमान तकर हमहूँ करितहुँ
ई बंधन .........................................................................

जखन तखन क' घूमि टहलि खयबा लेल दाना हम चुनितहुँ
धिया-पुता के खुआ पिया बचितय तं हम अपनो खईतहुँ
अपन मेहनतिक सुफल केहन होइत छै से हमहूँ चिखितहुँ
ई बंधन.............................................................................

जँ भेटितथि भगवान पुछितियनि कोन कर्म के सजा देलहुँ
की बिगाड़ने छलहुँ अहँक जे एहि जाल में फँसा देलहुँ
ई दुर्दिन देखबा सँ बढियां मरण वरण कयने रहितहुँ
ई बंधन.....................................................................

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