Sunday, April 25, 2010

गाछक व्यथा

हमर स्कूल सँ घरक बीच में,
बाट पर छल
एकटा खूब विशाल, फल सँ लदल
पात सँ सजल
गाछ...

जकरा छाहरि    में
हम सब सुस्ताइत छलहुँ
खेलाइत छलहुँ
आ डारि पर चढ़ी फल-फलहरी खाइत छलहुँ

मुदा समयक कुचक्र
ओकर पात कें खसा देलकई
फल केर बिला देलकई
ओतबे  नहि निर्दयी,
ओहि गाछ कें सुखा देलकई

आबो ओही बाटे हम सब चलैत छी
स्कूल जाइत छी आ फेरो घुरैत छी
आबो ओ गाछ हमरा सब दिस तकैत अछि    
ओही हुलसल दृष्टि संगे शोरो पाडैत अछि
मुदा,
आब हमही नहि कोनो बच्चा
ओकरा दिस तकितो नहि छी
आ खेलाइत-धूपाइत   
ओही बाट पर चलैत-फिरैत
ओहि गाछ सँ बहुत दूर चलि जाइत छी 
 
      

Saturday, April 24, 2010

आई "मानव" शब्द केर नहि भाववाचक फुरि रहल............

कथी लेल पाप ली हम माथ पर जे सत कतहु बाजी
जखन फुसिए फटक केर बोलबाला अछि एखन संसार में
श्लीलता, शालीनता केर पाग रखने छी मुदा
अश्लीलता, उद्दंड़ता केर मांग अछि बाज़ार में

कथी लेल बात कोनो कहल गेल हम जेठ केर मानी
चलाबथि  ओ हुकुम व्यर्थे, किये' ने हम कहब प्रतिकार में
माय-बाप संगे रहि प्रतिष्ठा हम खसाबी लोक लग?
वृद्धाश्रम में रहथि ओ  से अछि एखन व्यवहार में

कथी लेल हम करी चिंता, किये' हम आन लेल कानी
जखन अर्थेक अर्थक बोध टा अछि बाँचि गेल संसार में
अपन सुतरय काज से सब टा लगायब व्योंत हम
आन केर सुख-दुखक चिंता की करब बेकार  में ?

कोनो ई छल भयानक स्वप्न व सत्ते विचारक छल भंवर
छी आब चिंताग्रस्त आ भयभीत एहि विचार में
आई "मानव" शब्द केर नहि भाववाचक फुरि रहल
सिद्धांत ओ संवेदना भसिया चुकल अछि धार में

Wednesday, December 2, 2009

हेरायल शैशव

होइछ इच्छा शिशुए रहितहुँ
देख' पड़ैत ने जाति-धर्म 
वा तथाकथित सामाजिक स्थान अपन 
हंसबा लेल आ कि कनबा लेल 
 हँसितहुं तखने जँ मन खुशी 
जँ मन दुखी तखने कनितहुं 
होइछ इच्छा.................................... 

होइछ इच्छा शिशुए रहितहुँ 
कर' पड़ैत ने छल कपट आ दुर्व्यवहार 
ई जिनगी कें जीबाक लेल 
वा पेट मात्र पोषबाक लेल 
पी लितहुँ माय केर दूध 
और आशीष संगे जीवित रहितहुँ 
होइछ इच्छा........................ 

होइछ इच्छा शिशुए रहितहुँ 
कर' पड़ैत ने मारि-पीट आपा-धापी 
एहि अर्थयुगक बनबाक लेल 
वा दलदल में धँसबाक लेल 
स्नेह वृष्टि में भीजि-तीति हम 
आनन्दक अनुभव करितहुं 
होइछ इच्छा................................. 

होइछ इच्छा शिशुए रहितहुँ 
देख' पड़ैत ने लुप्त होइत 
मानवता मानव केर मन सँ 
सुख-शान्ति सबहक घर आँगन सँ 
सब क्यौ शैशव सँ शिक्षा ल' 
निश्छल, निश्पापी बनि पबितहुँ 
होइछ इच्छा.................................

Tuesday, December 1, 2009

तू आगू बढ़ शुरुआत त कर.................

ऐ घोर निराशा में डूबल, प्राणी तू बढ़ शुरुआत त' कर
आकाश सेहो तू नापि सकै छें, अपना पर विश्वास त' कर
तू आगू बढ़....................

जँ राति भेलई भिनसरो हेतई, ई सत्य थिकै ने मेटा सकै
ई समयचक्र एहिना चलैत अछि, मुदा एकर सम्मान त' कर
तू आगू बढ़.........................

बस व्यर्थे नोर बहौने की? समदाउन उदासी गौने की?
हम गीत विजय केर गायब सदिखन, प्रण ई ल' जीवन में चल
तू आगू बढ़ .............................

भगवानो मदति करथि ओकरे, जे सतत कर्म में लागल हो
फुसिए चिंता त्यजि जग भरि कें, जो कर्तव्यक पालन तू कर
तू आगू बढ़ ................................

किछु काज एहन कर जीवन में, जे मानवजातिक हित में हो
मरियो क' अमर बनल रह्बैं, मनु कल्याणक तू बाट त' धर
तू आगू बढ़...................................

मंत्री उवाच..................

छी मनुक्ख आ राजनीति करबाक अहाँ इच्छा रखैत छी
जन्मे सँ बुड़िलेल थिकहुँ की लोक देखि क ' भगल करै छी

देखू हमरा गत दसो वर्ष सँ मंत्री पद पर बैसि रहल छी
जे अबैत अछि सत्ता में हम तकरे पार्टी पैसि रहल छी
शहर राज्य केर किछु रईस में अपन नाम हम देखि रहल छी
फिफ्टी परसेन्टक लगभग त' फंडे में स' चूसि रहल छी
राजनीति में श्रेष्ठ थिकहुँ हम तें अपने स कहल करै छी
जन्मे सँ.....................................................................

समयक बंधन में नहि रहि हम अपन प्रतिष्ठा सतत बढाबी
पैघो सँ' पैघो अफसर कें आँगा-पाँछा अपन घुमाबी
अपने कतबो किछु क' ली धरि नीति केर उपदेश सुनाबी
शिलान्यास दस बीस पचासों क' नेता हम नीक कहबी
नेता केर हो एहन दुर्दशा? तें अपने स कहल करै छी
जन्मे सँ बुड़िलेल ....................................................

जे बाजब से किए करब हम मूलमंत्र बनब' पड़ैत अछि
ठकि फुसिया फेर भोट लेलहुँ ई प्रजातंत्र एहिना चलैत अछि
कतहु कतहु तँ बूथो तक कैप्चर हमरा करब' पड़ैत अछि
साम दाम वा दंड भेद सब विधा अपन लगब' पड़ैत अछि
बड़ सोझ सरल व्यवहार देखै छी, तें अपने स' कहल करै छी
जन्मे सँ..................................................................

आतंकी सबहक विरुद्ध जा अपना आफत किए मोल ली
लूटपाट में अपनहुँ छी तें ओकर पोल हम किए खोलि दी
सबटा बुझितो जनितो ओहि में अपना कें झोंक' पड़ैत अछि
आ राजनीति करबाक जँ इच्छा मानवता छोड़' पड़ैत अछि
गाँधी केर तीनू बानर कें अपन हम आदर्श बुझै छी
जन्मे सँ बुड़िलेल.........................................................

Friday, November 20, 2009

व्यथा

हम कोना क' हँसी हम ई बाजी कोना
हमर नोरो सुखा गेल कानी कोना ?

हमरा दिन केर इजोतो अन्हारे लगय
हम जे सोनो उठाबी त' माटिए बनय
हमहूँ नचितहुँ कने से जखन मोन हो
हमर घुघरू हेड़ा गेल नाची कोना?
हम कोना........................................

माछ दहियो सँ जतरा सुजतरा न हो
हम त' डेगो उठाबी जे खतरा न हो
हमहूँ गबितहुं कने से होअय लालसा
कंठ स्वरहीन भ' गेल गाबी कोना ?
हम कोना...................................

फूल केर बीज रोपी त' काँटे उगय
बात केहनो मधुर जग कें कड़ुए लगय
हमहूँ छुबितहुं गगन होय इच्छा प्रबल
छत सेहो नहि बचल नभ कें छूबी कोना?
हम कोना............................................

हमर घूँघरू भेटत मन में अछि आस से
कंठ में स्वर घुरत फेर विश्वास से
ओना छथिहो विधाता सेहो बाम छथि
हम अपन याचना ल' क' पहुँची कोना
हम कोना.......................................

Tuesday, November 17, 2009

कोरोना

छल मनुक्ख आतुर लड़बा लेल प्रकृति संग कोनहु रन  मे
सबटा काबिलती केर दाबी ध्वस्त भेलहि एक्कहि छन मे

सगर विश्व में पसरि गेल छल रोग आसुरी देखल केहन 
अपनहि शहर बजार लगै छल जेना कोनो हो निर्जन बन
कोरोना केर भय सं दुनिया सुटकि गेल छल आँगन मे
सबटा काबिलती केर दाबी....

लोक डाउन में होइत छल जे चिड़ै चुनमुनी रहितहुँ हम
पाँखि अपन पूरा पसारि आकाश भ्रमण कS सकितहुँ हम
कतेक कष्ट पिजड़ा में चिड़ै कें होइत हेतै सोचू मन मे
सबटा काबिलती केर दाबी......

हमरा लागल कोरोना केर बाद आँखि फुजतै लोकक
युद्ध, घृणा, हिंसा, विलासिता दिस कम मन जेतै लोकक  
मुदा जानी नहि की की देखबा, लेल बचल अछि जीवन मे
सबटा काबिलती केर दाबी....